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मूल्य अस्थिरता

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सतर्क रहने की जरूरत : अक्टूबर महीने के मुद्रास्फीति के आंकड़े

अक्टूबर महीने के मुद्रास्फीति के आंकड़ों से निकले कीमतों में एक स्वागत योग्य नरमी के इशारे इस वर्ष की शुरुआत से ही मुद्रास्फीति पर लगाम लगाने के लिए जूझ रहे मौद्रिक नीति से जुड़े अधिकारियों को थोड़ी राहत प्रदान करेंगे। पिछले महीने की खुदरा मुद्रास्फीति या उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित कीमतों में वृद्धि सितंबर माह के 7.41 फीसदी से घटकर 6.77 फीसदी हो गई। ऐसा खाद्य पदार्थों की कीमतों में एक सराहनीय गिरावट के कारण संभव हुआ। सरकार के मुताबिक “सब्जियों, फलों, दालों और तेल एवं वसा की कीमतों में हुई गिरावट” की मदद से उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक पर आधारित साल-दर-साल की मुद्रास्फीति अक्टूबर महीने में लगभग 160 आधार अंक गिरकर 7.01 फीसदी हो गई, जोकि पिछले महीने 8.60 फीसदी थी। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के कुल भार का करीब 46 फीसदी हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाले खाद्य और पेय पदार्थ उप-सूचकांक के साथ, खाद्य कीमतों में आई मंदी ने समग्र मुद्रास्फीति को कम कर दिया। यह एक अलग बात है कि कपड़े एवं जूते, आवास और स्वास्थ्य जैसी तीन अन्य आवश्यक श्रेणियों में कीमतें या तो सितंबर से थोड़ी बदलीं या फिर उनमें तेजी आई। थोक कीमतों के स्तर पर भी मुद्रास्फीति में गिरावट जारी रही और यह 19 महीनों में पहली बार इकाई अंकों में गिरकर सुर्खियों का हिस्सा बनी। उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में पसरती अनिश्चितता के बीच कच्चे तेल और इस्पात सहित विभिन्न वस्तुओं की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में एक अलग किस्म की नरमी के साथ एक अनुकूल आधार प्रभाव थोक मूल्य वृद्धि को कम करने में काफी हद तक सहायक रहा।

फिर भी खुदरा मुद्रास्फीति, विशेष रूप से खाद्य पदार्थों में मुद्रास्फीति के क्रमिक रुझानों पर बारीक नजर डालने से नीति निर्माताओं के सतर्क बने रहने की अनिवार्यता का पता चलता है। सितंबर माह में हांफने को मजबूर कर देने वाली 18 फीसदी की रफ्तार से बढ़ी सब्जियों की कीमतों में साल-दर-साल की मुद्रास्फीति पिछले महीने जहां तेजी से घटकर 7.77 फीसदी हो गई, वहीं महीने-दर-महीने की इसकी कीमतों में वृद्धि चार महीने के 4.1 फीसदी के उच्च स्तर पर पहुंच गई। यह तथ्य इस चिंता की ओर इशारा करता है कि सब्जी उगाने वाले क्षेत्रों में बेमौसम बारिश की वजह से आपूर्ति बाधित होने और साथ ही मानसून की बाढ़ से उत्पन्न ‘लॉजिस्टिक्स’ संबंधी दिक्कतों के कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव कम से कम फिलहाल बने रह सकते हैं।

निर्यात नियंत्रण के उपायों का इस्तेमाल करके अस्थिरता को कम करने के सरकार के ठोस प्रयासों के बावजूद, चावल और गेहूं सहित मुख्य अनाज की कीमतें भी चिंता का विषय बनी हुई हैं। खाद्य पदार्थों में सबसे बड़े भार वाली मुद्रास्फीति जहां पिछले महीने के 11.5 फीसदी से बढ़कर अक्टूबर में 12.1 फीसदी तक पहुंच गई, वहीं क्रमिक रूप से कीमतों में एक फीसदी के इजाफे से सितंबर माह की तुलना में इसके रफ्तार में कमी आई। देश के विभिन्न हिस्सों में भारी बारिश से धान की फसल के जलमग्न होने या प्रभावित होने की खबरों के साथ-साथ गेहूं और आटे की कमी की वजह से उनकी कीमतों मूल्य अस्थिरता मूल्य अस्थिरता में बढ़ोतरी के तथ्य अनाज की कीमतों में आगे और अस्थिरता आने का संकेत देते हैं। एस एंड पी ग्लोबल के ताजा बिजनेस आउटलुक सर्वेक्षण में मजदूरी और उत्पादकों द्वारा लागत निकालने संबंधी दबाव के बढ़ने के इशारों के मद्देनजर नीति निर्माता मुद्रास्फीति के खिलाफ लड़ाई में शिथिलता बरतने का जोखिम नहीं मोल ले सकते हैं।

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जलवायु परिवर्तन और संघर्ष के बीच इनके अनुकूल खाद्य प्रणालियां जरूरी हैं: रिपोर्ट

जलवायु में बदलाव, आर्थिक या राजनीतिक अस्थिरता और कीट या महामारी के कारण होने वाली चरम घटनाएं दुनिया भर में खाद्य असुरक्षा को बढ़ा सकती हैं। इस तरह की घटनाएं खेती और मत्स्य पालन उत्पादकता को कम करके, इस पर निर्भर रहने वाले लोगों के लिए खतरा पैदा करती है तथा खाद्य वितरण और सार्वजनिक सेवा वितरण को बाधित करते हैं।

एक नए अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में पानी की बढ़ती मांग अगले 20 वर्षों में खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में सामने आएगी। इसके बाद गर्मी, लू, सूखा, आय की असमानता और राजनीतिक अस्थिरता के दौरान एक ऐसी कृषि की जरूरत पड़ेगी जो दुनिया भर में खाद्य असुरक्षा से निपटने में महत्वपूर्ण हो। यह अध्ययन कोलोराडो बोल्डर विश्वविद्यालय की अगुवाई में किया गया है।

संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 2020 में भूख के पिछले सारे रिकॉर्ड पार हो चुके हैं और कई देशों में तीव्र खाद्य असुरक्षा इस वर्ष भी बदतर हो सकती है।

ये खतरे नए नहीं हैं, राजनीतिक संघर्ष और जलवायु परिवर्तन के पर्यावरणीय प्रभावों को पहले ही दुनिया भर में मापा और अध्ययन किया जा चुका है। हालांकि नए अध्ययन में पाया गया है कि शोध के इन क्षेत्रों के बीच सहयोग में वृद्धि न केवल इन खतरों में से किसी एक के सामने वैश्विक खाद्य असुरक्षा को दूर कर सकती है, बल्कि उन सभी के खिलाफ इसे मजबूती भी प्रदान कर सकती है।

अध्ययनकर्ता और पर्यावरण के सहायक प्रोफेसर जिया मेहराबी ने कहा हम यहां और वहां व्यक्तिगत समस्याओं मूल्य अस्थिरता से निपटने की कोशिश करने के बजाय सामान्य रूप से अधिक रेसिलिएंट या लचीली खाद्य प्रणालियों के निर्माण संबंधी तरीकों को समर्थन देते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस प्रणाली के लिए एक जलवायु, पर्यावरणीय या राजनीतिक झटका है, यदि आपके पास लचीली प्रणाली है, तो वे सभी विभिन्न प्रकार के झटकों से निपटने में सक्षम होंगे।

विश्व बैंक के एक हालिया विश्लेषण के मुताबिक, यूक्रेन में युद्ध से आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और कोविड-19 महामारी के निरंतर आर्थिक परिणाम ने खाद्य की कीमतों को सबसे उच्च स्तर पर धकेल दिया हैं। यह संयुक्त राष्ट्र के 2030 तक के लक्ष्य जिसमें सभी रूपों में भूख, खाद्य असुरक्षा और कुपोषण को समाप्त करना था, यह इसे पीछे धकेल रहा है। इसके अलावा, गर्मी, बाढ़ और सूखा जैसी चरम मौसम की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

जबकि शोधकर्ता और नीति निर्माता खाद्य प्रणालियों के लचीलेपन में सुधार के लिए समाधान विकसित कर रहे हैं, वे अक्सर एक समय में एक समस्या से निपटने के काम को अंजाम दे रहे हैं। नए अध्ययन में खाद्य प्रणालियों के लिए विशिष्ट खतरों का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं के बीच सहयोग और समन्वय बढ़ाने की बहुत आवश्यकता है, ताकि निर्णय लेने वालों के पास व्यापक जानकारी, अपडेटेड मॉडल और प्रासंगिक उपकरण हो जो खतरा होने पर उनसे निपटने में सक्षम हों।

संघर्ष, जलवायु में बदलाव और इनसे निपटने की क्षमता

कोविड-19 महामारी से पहले, 2019 में, शोधकर्ताओं ने खाद्य सुरक्षा से संबंधित विभिन्न क्षेत्रों में 69 वैश्विक विशेषज्ञों का सर्वेक्षण किया। उन्होंने अगले दो दशकों में अपने प्रभाव और संभावना दोनों के आधार पर 32 शीर्ष खाद्य सुरक्षा से संबंधित खतरों को स्थान दिया।

उन्होंने पाया कि जलवायु परिवर्तन के कारण कई पर्यावरणीय घटनाएं - जैसे कि अप्रत्याशित मौसम परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा पर सबसे अधिक बुरे प्रभाव डाल सकते हैं। उनके प्रभाव और संभावना दोनों को ध्यान में रखते हुए, पानी की मांग में वृद्धि, सूखा, गर्मी या लू और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं का पतन को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।

फिर भी उन्होंने यह भी पाया कि आय असमानता, दुनिया भर में मूल्य बढ़ने और राजनीतिक अस्थिरता तथा प्रवास द्वारा प्रस्तुत खाद्य सुरक्षा के लिए खतरे अगले दो दशकों में इन सबके होने की बहुत अधिक आशंकाएं हैं, इन खतरों को शीर्ष 10 में लाना अहम है।

दुनिया की आधी से अधिक खाद्य असुरक्षित आबादी संघर्ष वाले क्षेत्रों में रहती है। ये क्षेत्र वो है जहां राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद, नागरिक अशांति या सशस्त्र संघर्ष होता है। इन संघर्षों के कारण होने वाले प्रवास और विस्थापन को अगले 20 वर्षों में वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए शीर्ष 5 सबसे संभावित खतरों में स्थान दिया गया है।

महराबी ने कहा खाद्य सुरक्षा उत्पादन की समस्या नहीं है, यह वितरण, पहुंच और गरीबी की समस्या है जिसके कारण संघर्ष बढ़ गया है। संघर्ष न केवल लोगों को अधिक संवेदनशील बनाता है, बल्कि उनके ढलने या अनुकूलन करने की उनकी क्षमता को भी सीमित करता है।

यह संघर्ष भी नया नहीं है, यूक्रेन में संघर्ष और इथियोपिया में चल रहे गृहयुद्ध से पहले, सीरिया, यमन और अन्य जगहों पर गृहयुद्धों ने क्षेत्रीय और वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा पैदा किया है।

महराबी ने कहा यदि हम पहले से ही इन संघर्ष और चरम घटनाओं को हल करने पर ध्यान देते तो, कोविड होने के बाद हम बहुत बेहतर स्थिति में होते।

खाद्य असुरक्षा से निपटने के लिए शोध

शोधकर्ताओं ने सर्वेक्षण किए गए विशेषज्ञों से यह भी पूछा कि इन क्षेत्रों में सबसे बड़ी उत्कृष्ट शोध प्राथमिकताएं क्या हैं और वैज्ञानिकों तथा नीति निर्माताओं को किन शीर्ष 50 प्रश्नों पर ध्यान देना चाहिए।

कई प्राथमिकता वाले अलग-अलग खाद्य प्रणालियां हैं, क्योंकि अधिक विविध संस्थाएं आमतौर पर अधिक स्थिर होती हैं। उदाहरण के लिए, यूक्रेन ने 2021 में वैश्विक गेहूं निर्यात का 10 फीसदी और विश्व खाद्य कार्यक्रम की गेहूं की आपूर्ति का 40 फीसदी प्रदान किया, 2022 में देश पर रूस के हमलों से आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित हुई।

महराबी ने कहा जबकि हम इस चीज को नहीं बदल सकते हैं जहां कृषि भूमि वितरित की जाती है, शोधकर्ता और नीति निर्माता पूछ सकते हैं कि देश अपने खाद्य उत्पादन को स्थान और पोषण उत्पादन दोनों के मामले में कैसे विविधता प्रदान कर सकते हैं?

शोधकर्ता बेहतर खाका बनाने और पूर्वानुमान भी लगा सकते हैं, जो चरम घटनाओं से पहले, दौरान और बाद में खाद्य सुरक्षा को संरक्षित करने के लिए सक्रिय कदमों को की जानकारी दे सकते हैं। मेहराबी बताते हैं कि हमारे मानचित्रों के आंकड़ों का संग्रह आज शोधकर्ताओं के पास र्वानुमान लगाने के लिए उपलब्ध उन्नत उपकरणों के साथ तालमेल नहीं बिठाता है, कई मॉडल जमीनी स्तर पर माप से मेल खाने के साथ मान्य नहीं हैं।

महराबी ने कहा हम इसे अभी अपनी दुनिया में होते हुए मूल्य अस्थिरता देख सकते हैं, संघर्ष और जलवायु खराब हो रही है। रुझान दिखाते हैं और विशेषज्ञ सहमत हैं, यह भविष्य में और भी खराब हो सकता है। हम ऐसे खाद्य प्रणालियों का निर्माण और संचालन कैसे करेंगे जो सभी प्रकार के झटके और चरम घटनाओं के लिए लचीले हों? हमें इस बारे में सोचना शुरू करना होगा कि हम उन सभी प्रणालियों का निर्माण कैसे कर सकते हैं जो उन सभी के अनुरूप ढल सके या अनुकूलित हो सकें। यह रिपोर्ट वन अर्थ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई है।

आर्थिक समीक्षा 2015-16 की प्रमुख बातें

संसद में शुक्रवार को पेश वित्त वर्ष 2015-16 की आर्थिक समीक्षा की मुख्य बातें इस प्रकार हैं। - जीडीपी की वृद्धि 2016-17 में 7-7.5 प्रतिशत रहेगी। - चालू वित्त वर्ष में वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रहेगी.

आर्थिक समीक्षा 2015-16 की प्रमुख बातें

संसद में शुक्रवार को पेश वित्त वर्ष 2015-16 की आर्थिक समीक्षा की मुख्य बातें इस प्रकार हैं।
- जीडीपी की वृद्धि 2016-17 में 7-7.5 प्रतिशत रहेगी।
- चालू वित्त वर्ष में वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रहेगी, यदि निर्यात में तेज बढ़ोतरी हो तो दीर्घकाल में संभावित वृद्धि की क्षमता 8-10 प्रतिशत तक।
- वैश्विक स्तर पर निराशा के वातावरण में भारत स्थिरता की भूमि।
- कच्चे तेल का भाव अगले वित्त वर्ष में 35 डॉलर प्रति बैरल रहेगा जो इस वर्ष 45 डॉलर प्रति बैरल है।
- 2016-17 में खुदरा मुद्रास्फीति 4.5-पांच प्रतिशत रहने का अनुमान।
- मुद्रास्फीति में मजबूती के साथ निम्न स्तिर पर, मूल्य स्थिरता बढ़ी है।
- वेतन आयोग की सिफारिश लागू करने से मूल्य अस्थिरता नहीं आएगी।
- कर का दायरा बढ़ाया जाए, 20 प्रतिशत से अधिक लोगों को कर के घेरे में लाया जाए जो फिलहाल आबादी का 5.5 प्रतिशत है।
- चुनौतीपूर्ण वाह्य वातावरण आर्थिक नीतियों के लिए आशंका पैदा करेगा।
- राजकोषीय घाटा इस साल 3.9 प्रतिशत तक सीमित करने का लक्ष्य हासिल हो जाएगा, आने वाला साल चुनौतीपूर्ण है।
- अगले वित्त वर्ष में सब्सिडी बिल सकल घरेलू उत्पाद के दो प्रतिशत से कम रहेगा।
- जीएसटी विधेयक में देरी पर चिंता।
- कंपनियों, बैंकों की वित्तीय स्थिति पर दबाव बरकरार। चार और उपायों, पहचान, पुर्नपंजीकरण, समाधान,
समाधान और सुधार पर बल।
- सरकारी क्षेत्र बैंकों को 2018-19 तक 1.8 लाख करोड़ रुपए की इक्विटी पूंजी की जरूरत।
- चालू खाते का घाटा 1-1.5 प्रतिशत, विदेशी मुद्रा भंडार फरवरी मध्य तक 351.5 अरब डालर।
- वित्त वर्ष 2015-16 में सेवा क्षेत्र की वृद्धि 9.2 प्रतिशत।
- विदेशी पूंजी निकासी संभव को देखते हुए घरेलू मांग बढ़ाने का सुझाव।
- हालिया सुधार के कारण औद्योगिक, बुनियादी ढांचा, कारपोरेट क्षेत्रों के अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद।
- स्वास्थ्य, शिक्षा, में और निवेश, कृषि पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत।
- सरकारी कर राजस्व बजट अनुमान से अधिक रहेगा।
- निर्यात में नरमी बरकरार रहेगी, अगले वित्त वर्ष में तेजी आएगी।
- भारत को व्यापार में संरक्षणवादी पहलों के खिलाफ खड़ा होना चाहिए।
- उर्वरक क्षेत्र के लिए सुधार पैकेज का सुझाव।

दामों में अस्थिरता पर मूडीज ने चेताया

मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने एशिया प्रशांत क्षेत्र में खाद्य व ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव और कीमतों में बहुत ज्यादा संवेदनशीलता को लेकर फिलीपींस, थाईलैंड और वियतनाम के साथ भारत को चेतावनी दी है। मूडीज का कहना है कि रूस और यूक्रेन में टकराव के कारण आपूर्ति शृंखला बाधित हो रही है और कृषि उत्पादों, खासकर मोटे अनाज व खाद्य तेल के दाम के साथ-साथ उर्वरकों व कृषि में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्रियों की कीमतें बढ़ रही हैं, जिनका असर इन देशों पर बहुत ज्यादा है।

मंगलवार को जारी अपनी रिपोर्ट में मूडीज ने कहा कि ऐसा इसलिए है क्योंकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) बास्केट में ऊर्जा व खाद्य मूल्यों का अधिभार ज्यादा है।

भारत के सीपीआई में ऊर्जा व खाद्य का अधिभार 55 प्रतिशत से ज्यादा है। जून में लगातार चौथे महीने महंगाई दर 7 प्रतिशत से ज्यादा रही है, हालांकि यह मई में 7.97 प्रतिशत से घटकर 7.75 प्रतिशत आई है। वहीं दूसरी तरफ ईंधन व बिजली की महंगाई दर जून महीने में बढ़कर दो अंकों में 10.39 प्रतिशत पर आ गई, जो इसके पहले महीने में 9.54 प्रतिशत पर थी, जबकि केंद्र व राज्यों द्वारा डीजल व पेट्रोल पर शुल्क में कटौती के बाद इसकी कीमत घटी है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल प्रमुख उत्पादक राज्यों के कुछ इलाकों में फसल खराब हुई है और इस पर रूस यूक्रेन युद्ध के अलावा भारत की गर्म हवाओं का असर पड़ा है। गर्म हवाओं ने भारत में खासकर गेहूं की फसल खराब की है, जिसकी वजह से यह महंगा हुआ है। इससे अन्य फसलों जैसे आम, अमरूद और मिर्च पर भी असर पड़ा है। 2022 में भारत में पर्यावरण की स्थिति पर एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 11 मार्च से 18 मई के बीच 280 हीट वेव वाले दिन रहे हैं, जो 12 साल में सर्वाधिक है।

मूडीज ने कहा है कि भारत व अन्य देशों के सामने बड़ी चुनौती यह है कि महामारी के दौर के बाद उनके पास बहुत ज्यादा धन खर्च करने संभावना नहीं है और मौजूदा स्थितियों से सामाजिक जोखिम बढ़ रहा है।

केंद्र का राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2021-22 के 6.7 प्रतिशत से घटकर चालू वित्त वर्ष में 6.4 रहने का अनुमान लगाया गया है। हालांकि मुफ्त खाद्यान्न योजना और उर्वरक सब्सिडी में बढ़ोतरी को देखते हुए इस अनुमान पर भी दबाव है।

मूडीज ने कहा है, ‘घरेलू खाद्य की कीमतें बढ़ने की भरपाई करने की सरकार पर या सरकारी जिंस कंपनियों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा। इनमें से कुछ अर्थव्यवस्थाओं में वित्तीय समेकन सुस्त रह सकता है,क्योंकि व्यय करने का दबाव बना हुआ है।’

कृषि सब्सिडी को लेकर मूडीज ने कहा कि भारत में किसानों पर नेगेटिव सब्सिडी है।

क्रिप्टोकरेंसी में निवेश किए गए अमेरिकियों का हिस्सा क्रिप्टो सर्दियों के बावजूद 125% बढ़ता है

प्रचलित क्रिप्टो सर्दियों ने आंशिक रूप से कुछ निवेशकों को संभावित रैली के संकेतों के लिए बाजार की निगरानी करते हुए पीछे की सीट लेने के लिए मजबूर किया है। हालांकि, अमेरिकी निवेशकों के एक वर्ग के लिए ऐसा नहीं है, जो लंबे समय तक बाजार में गिरावट से अचंभित लगते हैं।

in क्रिप्टो · 13 Month10 2022, 18:01 · 0 टिप्पणियाँ

क्रिप्टोकरेंसी में निवेश किए गए अमेरिकियों का हिस्सा क्रिप्टो सर्दियों के बावजूद 125% बढ़ता है

फ़िनबोल्ड द्वारा प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, 2020 और 2022 की गर्मियों के बीच क्रिप्टो में निवेश करने वाले अमेरिकियों की हिस्सेदारी 125% बढ़ी। 2020 में, केवल 8% अमेरिकियों ने क्रिप्टो में निवेश किया था, जबकि 2022 तक, यह मूल्य 18% है।

क्रिप्टो में भाग लेने के इच्छुक निवेशकों की संख्या में वृद्धि का प्रक्षेपवक्र भी दिखाई देता है। 2020 की गर्मियों तक, केवल 11% अमेरिकियों के पास क्रिप्टो में उद्यम करने की योजना थी, जबकि 2022 में यह आंकड़ा 36.36% बढ़कर 15% हो गया।

के बीच, अनुसंधान ने निवेशकों

के लिए लचीलापन दिखाने और अलग-अलग सट्टेबाजी जारी रखने के लिए संभावित ड्राइवरों की पहचान की संपत्ति। मूल्य अस्थिरता शोध रिपोर्ट के अनुसार:

“विशेष रूप से, वृद्धि इंगित करती है कि विचाराधीन निवेशक अस्थिरता को कम कर सकते हैं। ऐसे निवेशक यह समझते हैं कि क्रिप्टो अभी भी एक उभरता हुआ परिसंपत्ति वर्ग और प्रौद्योगिकी है जिसका सामान्य वित्त क्षेत्र पर प्रभाव अभी तक पूरी तरह से ज्ञात नहीं है। इस लाइन में, कुछ मूल्य अस्थिरता निवेशक अल्पकालिक मूल्य अस्थिरता को नजरअंदाज करने और संभावित भविष्य के विकास पर ध्यान केंद्रित करने का विकल्प चुनते हैं।”

हालांकि, अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है जो सामान्य क्रिप्टो बाजार को प्रभावित कर सकती है। विशेष रूप से, प्रचलित मैक्रोइकॉनॉमिक कारकों की सीमा और विनियामक बहस संभावित रूप से इस क्षेत्र में निरंतर भागीदारी को प्रभावित करेगी।

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